ईंट भट्ठों पर मजदूरों का पलायन शुरू, बच्चों की पढ़ाई और टीकाकरण पर पड़ रहा असर
आठ महीने तक गांव से दूर रहेंगे परिवार, महादलित टोलों में आंगनबाड़ी केंद्रों की उपस्थिति भी घटी
हरनौत। बरसात का मौसम समाप्त होने और ठंड की दस्तक के साथ ही हरनौत प्रखंड क्षेत्र से ईंट भट्ठों पर काम करने के लिए मजदूरों का पलायन शुरू हो गया है। प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न गांवों के महादलित टोलों से महिला-पुरुष अपने बच्चों के साथ परिवार समेत दूसरे राज्यों की ओर रवाना होने लगे हैं। हर साल अक्टूबर से शुरू होने वाला यह सिलसिला अगले कुछ दिनों में और तेज होने की संभावना है।
हरनौत प्रखंड के बिरजू मिल्की, दैली, पोआरी, गोनावां, मुसहरी, चखामिंद, शेरपुर, गोखुलपुर, तेलमर, सरथा, कल्याण बिगहा, माधोपुर-सबनहुआ, मुढ़ारी, आमर और कोलावां समेत कई गांवों के महादलित टोलों में इन दिनों पलायन का नजारा देखने को मिल रहा है। मजदूर ऑटो, बस और मिनी ट्रकों पर बोरा-बिस्तर, बर्तन, कपड़े समेत जरूरत का सामान लादकर ईंट भट्ठों की ओर रवाना हो रहे हैं।
छह से आठ महीने तक दूसरे राज्यों में रहेंगे परिवार
मजदूरों ने बताया कि गांव में पर्याप्त रोजगार उपलब्ध नहीं होने के कारण पूरे परिवार के साथ पलायन करना उनकी मजबूरी है। अधिकांश परिवार छह से आठ महीने तक पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में स्थित ईंट भट्ठों पर काम करते हैं। वहां पति-पत्नी दोनों मिलकर ईंट पाथने और उससे जुड़े अन्य कार्य करते हैं।

मजदूरों के अनुसार, करीब दो माह पहले ही ब्रोकर गांव-गांव पहुंचकर मजदूरों को एडवांस राशि देकर बुक कर चुके हैं। भट्ठे पर पहुंचने के बाद मजदूरों को मुंशी के अधीन काम करना पड़ता है। चिमनी में कच्ची ईंट डालने का काम करीब दो महीने बाद शुरू होगा। तब तक फर्मा से ईंट बनाने, मिट्टी लाने, कच्ची ईंट तैयार करने और सूखी ईंटों को चिमनी तक पहुंचाने समेत विभिन्न कार्य पूरे परिवार के लोग मिलकर करते हैं।
अगले साल घर लौटने पर होता है मजदूरी का हिसाब
मजदूरों ने बताया कि अगले वर्ष 2027 में घर लौटने के बाद भट्ठा संचालक के साथ हिसाब-किताब किया जाता है। इसमें परिवार द्वारा तैयार की गई कच्ची ईंटों की संख्या और सप्ताहवार ली गई खोराकी की राशि का हिसाब लगाया जाता है। मजदूरों का कहना है कि आने वाले करीब दस दिनों में गांव से पलायन की रफ्तार और बढ़ेगी।
अस्थायी झुग्गियों में गुजरता है आठ महीने का समय
ईंट भट्ठों पर मजदूरों को अस्थायी झुग्गी-झोपड़ियों में रहना पड़ता है। परिवार के साथ आठ महीने तक गांव से दूर रहने का सीधा असर बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर पड़ता है। मजदूरों के अनुसार, इस दौरान बच्चों की नियमित पढ़ाई बाधित हो जाती है। साथ ही, छोटे बच्चों को समय पर नियमित टीकाकरण का डोज भी नहीं मिल पाता है।
वापसी के बाद चलाना पड़ता है विशेष टीकाकरण अभियान
इस संबंध में पीएचसी प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. राजीव रंजन सिन्हा ने बताया कि ईंट भट्ठों से मजदूरों की वापसी के बाद विभाग को विशेष रूप से नियमित टीकाकरण अभियान चलाना पड़ता है, ताकि पलायन के दौरान छूटे बच्चों के टीकाकरण को पूरा कराया जा सके।
वहीं, सीडीपीओ पिंकी कुमारी ने बताया कि मजदूरों के पलायन का असर आंगनबाड़ी केंद्रों पर भी देखने को मिल रहा है। महादलित टोलों से परिवारों के बाहर जाने के कारण आंगनबाड़ी केंद्रों पर नौनिहाल बच्चों की उपस्थिति कम होने लगी है।
