मरूआ की बदली तस्वीर, कभी किलो के भाव बिकता था, अब पुड़िया में दिख रहा
हरनौत – कभी ग्रामीण परिवारों के खान-पान का अहम हिस्सा रहा मरूआ अब हरनौत बाजार में बदले अंदाज में बिकता दिखाई दे रहा है। जिस मरूआ की कभी किलो, पसेरी और मन के हिसाब से खरीद-बिक्री हुआ करती थी, आज वही मरूआ छोटी-छोटी पुड़िया में पैक होकर बाजार में बिक रहा है। हरनौत बाजार में मरूआ की पुड़िया देखकर लोग पुराने दिनों को याद कर रहे हैं और इसके बदलते स्वरूप की चर्चा कर रहे हैं।
विश्वकर्मा मोड़ के पास एक ठेले पर मरूआ की बिक्री करते हुए देखा गया। यहां पीसा हुआ मरूआ और दाना वाला मरूआ छोटी-छोटी पुड़िया में रखा गया था। दुकानदार ने बताया कि जिउतिया पर्व को लेकर इसकी बिक्री की जा रही है। लोग अपनी जरूरत के अनुसार मरूआ की पुड़िया खरीद रहे हैं। पांच रुपये की दर से भी पैकेट उपलब्ध कराया जा रहा है। दुकानदार के अनुसार उसने करीब 120 रुपये प्रति किलो की दर से मरूआ खरीदा है। पर्व समाप्त होने के बाद इस तरह पुड़िया बनाकर मरूआ बेचने की जरूरत नहीं रहेगी।
पहले किलो और मन से होती थी खरीद-बिक्री
बुजुर्गों का कहना है कि एक समय ग्रामीण क्षेत्रों में मरूआ की अच्छी पैदावार होती थी। घरों में इसकी पर्याप्त मात्रा रखी जाती थी और जरूरत के अनुसार मरूआ को पीसकर आटा तैयार किया जाता था। इसकी खरीद-बिक्री किलो, पसेरी और मन के हिसाब से होती थी। ग्रामीण परिवार मरूआ से रोटी के अलावा ठेकुआ, लड्डू सहित कई पारंपरिक खाद्य पदार्थ तैयार करते थे।
उस समय मरूआ केवल बाजार में बिकने वाला अनाज नहीं था, बल्कि ग्रामीण जीवन और पारंपरिक खान-पान का हिस्सा था। खासकर पर्व-त्योहारों के दौरान इसका उपयोग अधिक होता था। जिउतिया पर्व के मौके पर कई परिवारों में आज भी मरूआ की रोटी बनाने और खाने की परंपरा कायम है।
10-20 ग्राम की पुड़िया में पहुंचा बाजार
समय के साथ लोगों की खान-पान की आदतों में बदलाव आया। बाजार में गेहूं, चावल और अन्य खाद्यान्नों की उपलब्धता बढ़ने के साथ मरूआ का घरेलू उपयोग धीरे-धीरे कम होता गया। इसका असर इसकी खेती और बाजार पर भी पड़ा। अब बड़े पैमाने पर मरूआ खरीदने के बजाय लोग जरूरत के अनुसार छोटी मात्रा में इसे खरीदते हैं।
हरनौत बाजार में भी इसका एक उदाहरण देखने को मिल रहा है। कभी जिस अनाज की खरीद-बिक्री किलो, पसेरी और मन के हिसाब से होती थी, वही अब करीब 10 से 20 ग्राम की छोटी पुड़िया में पीसा हुआ और दाना दोनों रूप में बिक रहा है। इससे मरूआ की बाजार में बदली हुई तस्वीर साफ दिखाई देती है।
पर्व से जुड़ी है मरूआ की परंपरा
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार जिउतिया पर्व में मरूआ का विशेष महत्व माना जाता है। कई परिवारों में इस अवसर पर मरूआ की रोटी बनाई जाती है। इसके अलावा मरूआ के आटे से ठेकुआ, लड्डू और अन्य पारंपरिक व्यंजन भी तैयार किए जाते हैं। पर्व के दौरान इसकी मांग बढ़ने के कारण बाजार में भी मरूआ की बिक्री दिखाई देने लगी है।
दुकानदारों का कहना है कि सामान्य दिनों में मरूआ की मांग सीमित रहती है, लेकिन पर्व के समय लोग इसे खरीदने पहुंचते हैं। यही वजह है कि इस समय छोटी-छोटी पुड़िया बनाकर इसकी बिक्री की जा रही है।
आधुनिक खेती के दौर में सिमट रही खेती
ग्रामीणों का कहना है कि आधुनिक खेती और बदलती कृषि पद्धति के कारण मरूआ की खेती पहले की तुलना में काफी कम हो गई है। किसान अधिक उत्पादन और बाजार में बेहतर कीमत मिलने वाले फसलों की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। इसके कारण पारंपरिक मोटे अनाजों की खेती का रकबा सिमटता जा रहा है।
हालांकि स्वास्थ्य के प्रति लोगों में बढ़ती जागरूकता के कारण मोटे अनाजों की मांग एक बार फिर बढ़ने लगी है। मरूआ को पौष्टिक अनाज माना जाता है और इसमें आयरन सहित कई पोषक तत्व पाए जाते हैं। ऐसे में स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग अब पारंपरिक अनाजों की ओर फिर से रुख कर रहे हैं।
पुरानी परंपरा और नए बाजार का संगम
हरनौत बाजार में छोटी पुड़िया में बिकता मरूआ ग्रामीण समाज में आए बदलाव की तस्वीर भी पेश कर रहा है। एक तरफ बुजुर्गों की यादों में मरूआ किलो, पसेरी और मन के हिसाब से बिकने वाला प्रमुख अनाज है, तो दूसरी ओर नई पीढ़ी के बाजार में वही मरूआ छोटी पुड़िया में नजर आ रहा है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मरूआ की खेती और पारंपरिक उपयोग को बढ़ावा देने की जरूरत है। इससे एक ओर किसानों को पारंपरिक फसल के लिए बाजार मिल सकता है, वहीं दूसरी ओर आने वाली पीढ़ी को स्थानीय खान-पान और पारंपरिक अनाजों से जोड़े रखने में मदद मिलेगी। जिउतिया जैसे पर्वों के दौरान बाजार में मरूआ की बढ़ी हुई मांग यह संकेत देती है कि बदलते दौर में भी इस पारंपरिक अनाज की उपयोगिता और सांस्कृतिक महत्व पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
