धूनि वर स्थल का है काफी महत्व, महात्मा ने यहीं पर रमायी थी धूनि, साधु-संतों व यात्रियों को छाया देता था पुराना विशालकाय धूनि वर

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राजगीर का प्राचीन धूनि वर स्थल, साधु-संतों की आस्था का केंद्र

अनुमंडल संवाददाता, राजगीर | राजीव लोचन की रिपोर्ट

राजगीर के स्थानीय कुंड क्षेत्र के समीप मलमास मेला मैदान के बीचों-बीच स्थित प्राचीन और ऐतिहासिक धूनि वर स्थल आज भी श्रद्धा और आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। यहां पहले एक विशालकाय वटवृक्ष (धूनि वर) हुआ करता था, जो आंधी में गिर गया। हालांकि उसी स्थान पर नया पेड़ लगाया गया है, लेकिन वह अभी पुराने वृक्ष की तरह विस्तृत और घना नहीं हो सका है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, पुराने धूनि वर की शाखाएं चारों ओर छाते की तरह फैली हुई थीं, जो वहां ठहरने वाले यात्रियों और साधु-संतों को गर्मी के दिनों में शीतल छाया प्रदान करती थीं। ढाई वर्ष पर लगने वाले प्रसिद्ध मलमास मेला के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले साधु-संत इसी स्थल पर विश्राम करते थे।

धूनि वर को लेकर एक प्रचलित मान्यता भी जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक बार मलमास मेला के दौरान यहां एक महात्मा ने धूनि रमाई थी। मेला समाप्त होने पर धूनि की थोड़ी सी जली लकड़ी शेष रह गई। महात्मा ने उस लकड़ी को उसी स्थान की मिट्टी में गाड़ दिया और अपने कमंडल से उस पर जल छिड़कते हुए आशीर्वाद दिया कि वह हरा-भरा होकर भविष्य में आने वाले यात्रियों को छाया प्रदान करे। मान्यता है कि महात्मा के आशीर्वाद से वही जली लकड़ी अंकुरित होकर एक विशाल वटवृक्ष के रूप में विकसित हुई, जिसे धूनि से उत्पन्न होने के कारण ‘धूनि वर’ कहा जाने लगा।

यह स्थल न केवल मलमास मेला के दौरान महत्वपूर्ण रहा है, बल्कि हर वर्ष वट सावित्री पूजा के अवसर पर भी हजारों की संख्या में सुहागिन महिलाएं यहां एकत्रित होकर पूजा-अर्चना करती हैं।

मलमास मेला पुनः निकट है। ऐसे में स्थानीय लोगों का मानना है कि मेला में आने वाले साधु-संतों और यात्रियों के लिए इस ऐतिहासिक धूनि वर स्थल के पास एक स्थायी विश्राम स्थल का निर्माण किया जाना चाहिए, ताकि इस प्राचीन आस्था स्थल की गरिमा और सुविधा दोनों बनी रहें।

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