34 साल पुराने हत्या कांड में चार अभियुक्तों को आजीवन कारावास

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हिलसा (नालंदा)। कहा जाता है कि “देर से मिला न्याय भी न्याय नहीं मिलने के बराबर होता है”, लेकिन जब वर्षों बाद भी अदालत दोषियों को सजा सुनाती है, तो वह कानून की मौजूदगी और उसकी ताकत को भी दर्शाता है। इसी कड़वी सच्चाई के बीच हिलसा व्यवहार न्यायालय ने 34 वर्ष पुराने एक जघन्य हत्या कांड में फैसला सुनाते हुए चार अभियुक्तों को आजीवन कारावास की सजा दी है।

हिलसा व्यवहार न्यायालय के प्रथम जिला एवं अपर सत्र न्यायाधीश आलोक कुमार पांडे की अदालत ने थरथरी थाना कांड संख्या 375/91 में सुनवाई पूरी होने के बाद थरथरी थाना क्षेत्र के कझियावां गांव निवासी अर्जुन गोप, धुरी गोप, करेली गोप एवं कारु उर्फ विजेंद्र गोप को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही चारों अभियुक्तों पर 25-25 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया है। अर्थदंड का भुगतान नहीं करने की स्थिति में उन्हें पांच माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा।

इसके अतिरिक्त न्यायालय ने आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत अभियुक्त अर्जुन गोप एवं धुरी गोप को तीन वर्ष का कारावास एवं 10-10 हजार रुपये का अर्थदंड भी सुनाया है। अर्थदंड की राशि अदा नहीं करने पर दो माह का अतिरिक्त साधारण कारावास भुगतना होगा। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी।

इस कांड में नामजद तीन अन्य अभियुक्तों की लंबी सुनवाई के दौरान पूर्व में ही मृत्यु हो चुकी है।
अभियोजन पक्ष की ओर से स्पेशल लोक अभियोजक राजाराम सिंह ने न्यायालय में सशक्त पक्ष रखते हुए अभियुक्तों को कठोरतम सजा देने की मांग की थी।

मामले के अनुसार यह जघन्य घटना 11 नवंबर 1991 की सुबह घटित हुई थी। अभियोजन के अनुसार आरोपियों ने पुरानी दुश्मनी के कारण श्यामशरण प्रसाद की निर्मम हत्या कर दी थी। घटना के बाद से यह मामला न्यायालय में लंबित था।

तीन दशक से अधिक समय तक चली न्यायिक प्रक्रिया ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि कानून भले ही देर से चलता हो, लेकिन वह पूरी तरह मौन नहीं रहता। इस दौरान जहां गवाहों की उम्र ढल गई, वहीं कई अभियुक्त और पीड़ित इस दुनिया से चले गए। इसके बावजूद अदालत का यह फैसला न्याय में विश्वास रखने वालों के लिए एक अहम संदेश है कि सच अंततः सामने आता है और झूठ ज्यादा दिनों तक टिक नहीं पाता।

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