राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि सुरक्षा, संस्कृति व सामाजिक मूल्यों से जुड़ी अवधारणा : उदय माहूरकर
बढ़ती अश्लील सामग्री और उसका समाज पर प्रभाव बन रहा चिंता का विषय : उदय माहूरकर
स्टोरीटेलिंग केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विचारों और सच को सामने लाने का सशक्त साधन : संध्या गोखले
अनुमंडल संवाददाता, राजगीर। राजीव लोचन की रिपोर्ट, राजगीर (नालंदा)। अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में चल रहे नालंदा इंटरनेशनल लिटरेचर फेस्टिवल में शनिवार को विभिन्न सत्रों में विद्वानों ने अपनी बातें रखीं। पहले सत्र की शुरूआत ‘राष्ट्रवाद’ जैसे महत्वपूर्ण विषय से हुई, जिस पर उदय माहूरकर और लिपिका भूषण ने अपने विचार रखे। उदय माहूरकर ने कहा कि राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों से जुड़ी व्यापक अवधारणा है। उन्होंने महात्मा गांधी के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि गांधी जी के सेवा मॉडल, स्वच्छता, हिंदू-मुस्लिम एकता और पूर्ण अहिंसा जैसे सिद्धांतों पर देश में गंभीर और खुली राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में कई विचारकों ने राष्ट्र के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण दृष्टि दी थी, जिनमें वीर सावरकर का भी उल्लेख किया गया, जिन्होंने दशकों पहले कई सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों को लेकर चेतावनी दी थी। उदय माहूरकर ने आधुनिक समय में बढ़ती अश्लील सामग्री (पोर्नोग्राफी) और उसके समाज पर पड़ते प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की। उनके अनुसार डिजिटल माध्यमों, ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं और बच्चों तक आसानी से पहुंच रही इस सामग्री का पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। कहा कि इस समस्या से निपटने के लिए कड़े कानून, तकनीकी नियंत्रण, जागरूकता अभियान और बच्चों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाने के प्रयास आवश्यक है। इससे भारत एक सुरक्षित और नैतिक रूप से सशक्त समाज की दिशा में आगे बढ़ सके।
वहीं लिपिका भूषण ने ‘अखंड भारत’ की अवधारणा पर विचार रखते हुए प्रश्न उठाया कि क्या वर्तमान समय में इस विचार को व्यावहारिक रूप से संभव माना जा सकता है या यह केवल एक वैचारिक सपना बनकर रह जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे विषयों पर तर्कपूर्ण और स्वस्थ बहस लोकतंत्र की मजबूती का संकेत है। कहा कि भारत एक विविधताओं वाला राष्ट्र है। यहां अनेक जातियां, भाषाएं और समुदाय रहते हैं। ऐसे में सच्चा राष्ट्रवाद अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखते हुए समाज में नैतिकता, जिम्मेदारी और संवाद की परंपरा को मजबूत करने में निहित है, ताकि भारत भविष्य में एक अधिक जागरूक, संतुलित और सशक्त राष्ट्र बन सके। दूसरे सत्र में वकील सह प्रसिद्ध पटकथा लेखिका संध्या गोखले ने कहा कि स्टोरीटेलिंग केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के विचारों और सच को सामने लाने का सशक्त साधन है। आज ओटीटी प्लेटफॉर्म और फिल्मों का प्रभाव पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है, इसलिए उनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी हो गई है। जब कहानियां लाखों लोगों की सोच को प्रभावित करती हैं, तो दर्शकों को उन्हें देखने के साथ-साथ प्रश्न करने और आलोचना करने का भी पूरा अधिकार है। यदि किसी फिल्म या सामग्री में पक्षपात, प्रोपेगेंडा या भ्रामक प्रस्तुति दिखाई देती है, तो उस पर खुलकर बोलना और उसे चिन्हित करना समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। स्वस्थ आलोचना ही सिनेमा और रचनात्मक अभिव्यक्ति को अधिक जिम्मेदार और संवेदनशील बनाती है। वहीं तीसरे सत्र में “साहित्य समाज को कैसे आकार देता है” विषय पर चर्चा हुई, जिसमें लेखक शांतनु गुप्ता और लेखिका अमी गणात्रा ने अपने विचार साझा किए। वक्ताओं ने कहा कि साहित्य केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सोच, मूल्यों और चेतना को दिशा देने का सशक्त साधन है। उन्होंने भारतीय ग्रंथों, इतिहास और परंपरागत साहित्य की प्रासंगिकता पर जोर देते हुए कहा कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों और ज्ञान परंपरा से जोड़ना आज की बड़ी आवश्यकता है।
