विकास के दावों के बीच बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही रैतर पंचायत

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25 हजार की आबादी, फिर भी न स्वास्थ्य केंद्र, न हाईस्कूल का अपना भवन; सड़क, शिक्षा और रोजगार की समस्या बरकरार, कचरा उठाव बंद होने से तालाब भी हो रहा प्रदूषित

गिरियक (नालंदा) : गिरियक प्रखंड की रैतर पंचायत करीब 25 हजार की आबादी और 14 वार्डों वाली पंचायत है। पंचायत में रैतर, धरमपुर, भोजपुर, बेलदरिया, तारापुर, ठाकुरबिगहा, विशुनपुर, कालीबीघा, दुर्गानगर, बंगालीबीघा, जीवलाल बिगहा, गुलजार बिगहा, तरोखर, शंकरपुर और महमदपुर समेत 15 गांव शामिल हैं। पंचायत में 12 टोले भी हैं। चार राजस्व गांव रैतर, तारापुर, महमदपुर और कसूचक हैं, जिसमें कसूचक राजस्व गांव आबादीविहीन है। मुख्य जिला कार्यालय से पंचायत की दूरी करीब 17 किलोमीटर है। करीब 1600 घरों वाली इस पंचायत में बड़ी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रही है।

पांच मध्य विद्यालय, लेकिन हाईस्कूल का अपना भवन नहीं

पंचायत में पांच मध्य विद्यालय हैं, लेकिन हाईस्कूल का अपना भवन नहीं है। बेलदरिया गांव के मध्य विद्यालय के भवन में ही महज खानापूर्ति के लिए हाईस्कूल संचालित हो रहा है। पंचायत क्षेत्र के छात्र-छात्राओं को उच्च माध्यमिक शिक्षा के लिए करीब तीन किलोमीटर दूर पावापुरी का रुख करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत की बड़ी आबादी के लिहाज से यहां बेहतर शैक्षणिक व्यवस्था की जरूरत है।

पंचायत की साक्षरता दर में भी महिला और पुरुषों के बीच बड़ा अंतर है। पुरुष साक्षरता दर 69.24 प्रतिशत, जबकि महिला साक्षरता दर महज 42.75 प्रतिशत बताई गई है।

15 आंगनबाड़ी केंद्र, तीन दूसरे भवनों में संचालित

रैतर पंचायत में कुल 15 आंगनबाड़ी केंद्र हैं। इनमें 12 केंद्र अपने भवन में संचालित हो रहे हैं। वहीं आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 149 विद्यालय भवन, केंद्र संख्या 150 किराये के मकान और केंद्र संख्या 151 सामुदायिक भवन में संचालित हो रहा है। रैतर गांव स्थित आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 82 का सरकारी भवन जर्जर स्थिति में है। ऐसे में छोटे बच्चों की सुरक्षा और सुविधाओं को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

पशुपालक आधारित पंचायत, लेकिन दूध के लिए नहीं है शीत संग्रह केंद्र

रैतर पंचायत की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से पशुपालन पर आधारित है। ग्रामीणों के अनुसार करीब 70 प्रतिशत परिवार दूध बेचकर अपनी आजीविका चलाते हैं, जबकि करीब 30 प्रतिशत लोग खेती पर निर्भर हैं। रोजगार के लिए बड़ी संख्या में युवा पलायन कर चुके हैं।

सबसे बड़ी समस्या दूध के उचित बाजार और संग्रहण की है। पंचायत में दूध के लिए सरकार की ओर से कोई शीत संग्रह केंद्र नहीं है। इसके कारण पशुपालकों को दूध लेकर बिहारशरीफ और नवादा जैसे शहरों तक जाना पड़ता है। कई बार स्थानीय बिचौलियों को ही कम कीमत पर दूध बेचने की मजबूरी होती है। ग्रामीणों का सवाल है कि जब नालंदा में सुधा डेयरी प्लांट मौजूद है, तो रैतर पंचायत जैसे पशुपालक बहुल क्षेत्र में दूध संग्रहण की समुचित व्यवस्था क्यों नहीं की जा रही है।

25 हजार की आबादी, फिर भी उप स्वास्थ्य केंद्र नहीं

रैतर पंचायत में करीब 25 हजार की आबादी के बावजूद अपना कोई उप स्वास्थ्य केंद्र नहीं है। खासकर गर्भवती और धात्री महिलाओं को इलाज और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। ग्रामीणों के अनुसार उन्हें करीब तीन किलोमीटर दूर सीएचसी गिरियक या पावापुरी मेडिकल कॉलेज जाना पड़ता है। आपात स्थिति में ऑटो या निजी साधनों से मरीजों को अस्पताल ले जाना पड़ता है।

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स्वच्छता मॉडल से कचरा उठाव बंद होने तक का सफर

रैतर गांव के उप प्रमुख प्रतिनिधि रामानंद सागर और ग्रामीण धर्मेंद्र कुमार बताते हैं कि कभी रैतर पंचायत को स्वच्छता का मॉडल पंचायत माना जाता था। लोहिया स्वच्छता अभियान के तहत घर-घर से कचरा उठाव की व्यवस्था शुरू की गई थी। महमदपुर मुसहरी में कचरे के रिसाइक्लिंग के लिए भवन भी बनाया गया, लेकिन ग्रामीणों के अनुसार आज तक इसका समुचित उपयोग नहीं हो सका।

घर-घर कचरा उठाव के लिए पंचायत में गाड़ियां भी खरीदी गईं, लेकिन करीब 14 महीने बाद व्यवस्था बंद हो गई। इसमें काम करने वाले कर्मियों को मानदेय का भुगतान नहीं होने की बात भी ग्रामीणों ने कही है। इसके बाद कचरा उठाव पूरी तरह बंद हो गया।

कचरा उठाव बंद होने का असर गांव के पर्यावरण पर भी दिखाई देने लगा है। रैतर गांव में करीब दो बीघा क्षेत्र में बने छठ घाट वाले तालाब में ग्रामीणों द्वारा कचरा फेंके जाने और नाले का पानी गिरने से तालाब प्रदूषित हो रहा है। छठ पर्व के दौरान इसी तालाब का उपयोग ग्रामीण करते हैं।

कालीबीघा की सड़क आज भी अधूरी, नाले का पानी बना परेशानी

रैतर पंचायत के कालीबीघा गांव की स्थिति भी विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है। ग्रामीणों के अनुसार आजादी के बाद से गांव को राष्ट्रीय राजमार्ग-20 से जोड़ने वाली मुख्य सड़क का निर्माण अब तक नहीं हो सका है। गांव तक जाने वाला रास्ता कच्चा है और सड़क पर ही गंदे नाले का पानी बहता रहता है। इसी रास्ते से ग्रामीणों को आवागमन करना पड़ता है।

कालीबीघा के ग्रामीण महेश यादव, शिवलाल यादव और राहुल कुमार का आरोप है कि गांव जाने वाले रास्ते के दोनों ओर करीब तीन बीघा सरकारी जमीन पर वर्षों से कब्जा कर पक्का निर्माण कर घर बना लिए गए हैं। उनका कहना है कि जल निकासी के लिए नाला नहीं बनने के कारण गंदा पानी रास्ते पर जमा रहता है।

ग्रामीणों का यह भी कहना है कि कथित अतिक्रमण के मामले में प्रभावशाली लोगों के दबाव के कारण वे अधिकारियों से शिकायत करने में भी डरते हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से मामले की जांच कर सरकारी जमीन को अतिक्रमणमुक्त कराने और जल निकासी की व्यवस्था कराने की मांग की है।

विकास के दावों के बीच कई सवाल

करीब 25 हजार की आबादी और 14 वार्डों वाली रैतर पंचायत में शिक्षा, स्वास्थ्य, पशुपालन, स्वच्छता और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं की स्थिति ग्रामीणों की चिंता बढ़ा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि पंचायत में विकास की कई योजनाएं शुरू तो हुईं, लेकिन कई योजनाएं अधूरी या बंद पड़ी हैं। जरूरत है कि संबंधित विभाग पंचायत की समस्याओं का स्थलीय निरीक्षण कर प्राथमिकता के आधार पर समाधान करे, ताकि बड़ी आबादी को बुनियादी सुविधाओं के लिए दूसरे इलाकों पर निर्भर न रहना पड़े।

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