भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका अहम : डॉ. शमिका रवि

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अनुमंडल संवाददाता, राजगीर।

राजीव लोचन की रिेपोर्ट…

राजगीर(नालंदा)। भारत की विकास यात्रा में महिलाओं की भूमिका एक अत्यंत रोचक और प्रेरणादायक अध्याय है। महिलाओं की बढ़ रही भागीदारी से देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान है। ये बातें प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की सदस्य एवं भारत सरकार में सचिव डॉ. शमिका रवि ने नालंदा विश्वविद्यालय में नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग 2026 के उद्घाटन समारोह में कहीं। उन्होंने भारत की विकास यात्रा का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने आर्थिक परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन और क्षेत्रीय विकास की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए श्रम बाजार, लैंगिक भागीदारी और वैश्विक आर्थिक परिवर्तनों से जुड़ी चुनौतियों पर भी प्रकाश डाला। येल विश्वविद्यालय के ग्लोबल जस्टिस प्रोग्राम के निदेशक और दार्शनिक प्रो. थॉमस पोगे ने विकास के पारंपरिक मापदंडों की आलोचनात्मक समीक्षा करते हुए कहा कि जीडीपी और सकल राष्ट्रीय आय जैसे संकेतक समाज में असमानता, मानव कल्याण और पर्यावरणीय प्रभावों को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते। उन्होंने कहा कि 2030 के बाद के विकास विमर्श को सार्थक बनाने के लिए विकास के आकलन को व्यक्ति-केंद्रित, बहुआयामी और नैतिक दृष्टिकोण पर आधारित बनाना होगा। विख्यात अर्थशास्त्री और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के एमेरिटस प्रोफेसर प्रो. दीपक नय्यर ने कहा कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बदलते वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य के कारण धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।

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हालांकि उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जलवायु परिवर्तन, आर्थिक स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा जैसी साझा चुनौतियों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग पहले की तरह ही महत्वपूर्ण बना हुआ है। कहा कि ग्लोबल साउथ के देशों का बढ़ता आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव एक अधिक संतुलित और बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के निर्माण में योगदान दे रहा है। इससे पहले सेमिनार के शुरूआत में नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी सबों का स्वागत किया। उन्होंने विकास, समानता और सततता से जुड़े वैश्विक संवादों को पुनर्जीवित करने के महत्व पर प्रकाश डाला। कहा कि नालंदा डेवलपमेंट डायलॉग जैसे मंच उभरती चुनौतियों-जैसे बढ़ती असमानताएँ, आर्थिक विकास की पारिस्थितिक सीमाएं और बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य से निपटने के साथ-साथ 2030 के बाद के विकास एजेंडा के लिए नये विचारों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नालंदा जैसे संस्थानों की जिम्मेदारी पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि अकादमिक जगत और नीति-निर्माण के बीच सेतु स्थापित करने वाला समावेशी और अंतःविषय संवाद आवश्यक है, ताकि विशेषकर ग्लोबल साउथ के दृष्टिकोण से संतुलित और न्यायसंगत विकास को आगे बढ़ाया जा सके। इस सेमिनार में भारत और विदेश के प्रमुख नीति-निर्माताओं, अर्थशास्त्रियों और डेवेलपमेंन्ट एक्सपर्ट्स ने वैश्विक विकास की उभरती चुनौतियों तथा 2030 के बाद की विकास रूपरेखा पर विचार-विमर्श किया। सेंटर फॉर स्टडीज इन डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी द्वारा आयोजित यह संवाद विकास, सततता और वैश्विक सहयोग से जुड़े विषयों पर अकादमिक और नीतिगत विमर्श को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण मंच है।

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