ऐतिहासिक सरस्वती नदी का तेजी से हो रहा अतिक्रमण, किसान परेशान :सरस्वती नदी के पानी से हजारों एकड़ खेती का होता था पटवन
अतिक्रमण से नदी बन गया नाली, किसानों ने कहा कि नदी की हो उड़ाही, हो अतिक्रमण मुक्त
अनुमंडल संवाददाता, राजगीर।
राजीव लोचन की रिपोर्ट,
राजगीर(नालंदा)। पर्यटक नगरी के ऐतिहासिक व धार्मिक सरस्वती नदी का अस्तित्व धीरे-धीरे समाप्त होते जा रही है। जहां पहले इस नदी में पानी की धार अनवरत बहते रहती थी। उस पानी से दर्जनों गांवों के किसानों की हजारों एकड़ खेतों का पटवन होता था। वहीं अब इस नदी के किनारों में हो रहे लगातार अतिक्रमण से न तो इसमें पानी बचा है और न इसकी नदी के समान चौड़ाई। धीरे-धीरे यह अब एक नाली का रूप ले चुका है। इसके किनारों में दुकानदारों व आम लोगों ने अतिक्रमण कर घर या दुकान बना लिया है। सरकार की जल जीवन हरियाली योजना से भी यह नदी दूर रही। उस योजना में अगर इसे जोड़ा जाता तो इसकी उड़ाही हो सकती थी। नदी के नाली बन जाने से दर्जनों गांवों हजारों एकड़ खेती का पटवन का साधन समाप्त हो चुका है। किसानों के इस परेशानी की ओर किसी का कोई ध्यान नहीं है। लोगों व किसानों ने कहा कि सरकार चाहे तो इस नदी की मापी कराकर उड़ाही करा सकती है। इससे नदी में दोबारा से धार बहने लगेगी। किसानों ने कहा कि सरकार इस नदी की उड़ाही जल जीवन हरियाली योजना से कराये। इससे इसकी पूरी चौड़ाई भी निकल जायेगी।

कुछ साल पहले इसके किनारों को सौंदर्यीकरण के नाम पर पत्थर लगायी गयी थी। पत्थर लगाने वाले में न तो नदी किनारों से अतिक्रमण हटाना मुनासिब समझा और न प्रशासन ने। इसका नतीजा यह हुआ कि जितनी जगह थी उसी में उन्होंने पत्थर लगा दी। इससे यह नदी नाली का रूप ले लिया। लेदुआ पुल से लेकर रेलवे स्टेशन रोड तक इधर कुछ सालों में लगातार लोगों के द्वारा अतिक्रमण किया जा रहा है। लोगों ने नदी को भर दिया है। वहीं हद तो अब यह हो गयी है कि इस ऐतिहासिक नदी में नगर परिषद राजगीर के द्वारा सड़क बनाने का टेंडर पास कर दिया गया है। इससे किसान परेशान हो रहे हैं। अब उनकी खेतों तक पानी नहीं पहुंच सकेगी। वहीं नदी में ही विगत सालों में सिवरेज का सम्प बनाया गया। इस कारण वहां की आस-पास की जमीनों पर भी झूग्गी-झोपड़ी देकर लोगों ने अपनी दुकानें बना रखी है। जमीन पर लोगों ने कब्जा जमा लिया। इसके बाद भी प्रशासन गहरी नींद में सोई हुई है। लोगों ने कहा कि लेदुआ पुल से इस नदी का पानी दो दिशाओं में जाती है जिससे पहले हजारों एकड़ खेती की पटवन हुआ करता था। अब इसमें न तो उपर से पानी आता है और न नदी का अस्तित्व ही बचा है। लेदुआ पुल से पंडितपुर जाने वाली रास्ते में तो पुल से लेकर रेलवे स्टेशन रोड या फिर पंडितपुर तक लोगों ने इसके किनारों को भरकर भवन या फिर सड़क बना लिया। हालाकि कुछ साल पहले तक पंडितपुर के किसान पानी को खेतों तक ले जाने को लेकर आंदोलन करते रहते थे। अब किसान भी थक गए। किसान करें तो क्या करें। अब उन किसानों की खेती भगवान भरोसे हो गयी है। पूरी तरह से बारिश पर निर्भर है। किसानों ने कहा कि अगर सरकार चाहे नदी के किनारों को अतिक्रमण से मुक्त करा कर उड़ाही करा दे तो इसमें फिर से वहीं धार लौट सकती है। इस नदी में वैतरणी नदी का भी पानी आता था। उनके बंजर हो रहे खेतों में हरियाली वापस आ सकती है।
