मघड़ा में तीन दिवसीय शीतलाष्टमी मेले की तैयारी पूरी, आज से उमड़ेगा आस्था का सैलाब
शंकर कुमार सिन्हा की रिपोर्ट,
बिहारशरीफ (नालंदा)। बिहारशरीफ मुख्यालय से करीब 5 किलोमीटर दूर स्थित ऐतिहासिक मघड़ा गांव में आस्था का सैलाब उमड़ने को तैयार है। पंचाने नदी के पश्चिमी तट पर स्थित प्राचीन सिद्धपीठ मां शीतला मंदिर, मघड़ा में मंगलवार से तीन दिवसीय वार्षिक शीतलाष्टमी मेला का भव्य आगाज होगा।
चैत्र कृष्ण सप्तमी से शुरू होने वाले इस मेले को लेकर बिहार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, पश्चिम बंगाल, दिल्ली और उत्तराखंड सहित कई राज्यों से श्रद्धालुओं के आने की संभावना है। इसके अलावा विदेशों से भी भक्त यहां पहुंचकर माता शीतला के दरबार में मत्था टेकते हैं।
इतिहास की परतों में मघड़ा का महत्व
मंदिर की प्राचीनता का उल्लेख प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में भी मिलता है। मंदिर के पुजारी मिथलेश कुमार मिश्रा के अनुसार जब ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में अध्ययनरत थे, तब वे बड़ी पहाड़ी स्थित पुस्तकालय से विश्वविद्यालय जाने के क्रम में इसी क्षेत्र में नीम और पीपल के पेड़ों की छांव में विश्राम किया करते थे। उन्होंने अपनी रचनाओं में इस देवी स्थान का विशेष उल्लेख किया है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर के खंड किए, तब भगवान शिव ने उनके अवशेषों को एक ‘मघ’ (घड़े) में रखकर इसी पवित्र भूमि पर छिपाया था। इसी कारण इस गांव का नाम मघड़ा पड़ा। बाद में राजा वृषकेतु को माता ने स्वप्न में दर्शन दिए, जिसके बाद खुदाई में मां की प्रतिमा प्राप्त हुई।
‘मिट्ठी कुआं’ के जल से बनता है बसियौरा
मघड़ा मंदिर की सबसे खास परंपरा ‘बसियौरा’ पूजा है। सप्तमी के दिन श्रद्धालु चने की दाल, चावल और सब्जी का प्रसाद बनाते हैं और अष्टमी के दिन माता को बासी भोग अर्पित करते हैं। इस दौरान पूरे गांव में चूल्हा नहीं जलता और स्वच्छता के विशेष नियमों का पालन किया जाता है।
इस प्रसाद को बनाने के लिए गांव के ऐतिहासिक ‘मिट्ठी कुआं’ के जल का उपयोग किया जाता है। लोकमान्यता है कि जहां से माता की प्रतिमा प्रकट हुई थी, वही स्थान आज कुएं के रूप में मौजूद है और उसका पानी भीषण गर्मी में भी कभी नहीं सूखता।
आरोग्य और मनोकामना की देवी
मां शीतला को चेचक जैसे असाध्य रोगों से मुक्ति देने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता के दरबार का जल और भभूत लगाने से चर्म रोगों से राहत मिलती है। मन्नत पूरी होने पर भक्त ‘जीव के बदले जीव’ अर्पित करने की परंपरा के तहत कबूतर सहित अन्य भेंट चढ़ाते हैं।
सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम
मेले की व्यापकता को देखते हुए नगर निगम और जिला प्रशासन ने सुरक्षा के विशेष इंतजाम किए हैं। वार्ड पार्षद प्रतिनिधि जयंत शर्मा ने बताया कि इस बार पूरे मेला क्षेत्र में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। मंदिर परिसर में 16 और बाहरी क्षेत्रों में 20 कैमरे लगाए गए हैं, जिनकी निगरानी कंट्रोल रूम से की जाएगी।
श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए लाइटिंग, पेयजल, मोबाइल शौचालय और मेडिकल कैंप की व्यवस्था की गई है। वहीं किसी भी अप्रिय घटना से निपटने के लिए तालाब के पास एसडीआरएफ की टीम को भी तैनात रहने का निर्देश दिया गया है।
