कतरीसराय में परंपरागत होली की यादें धुंधली, कभी लोकगीतों से गूंजता था गांव का माहौल

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रानी सिन्हा की रिपोर्ट,

कतरीसराय। फाल्गुन मास के आगमन के साथ ही कतरीसराय के गांवों में होली का उल्लास देखते ही बनता था। जैसे ही संध्या ढलती, गांव की चौपाल पर ग्रामीणों की टोली एकत्र हो जाती और आधी रात तक पारंपरिक फाग गीतों की मधुर स्वर-लहरियां वातावरण में गूंजती रहती थीं।

गांव की चौपाल पर “राम खेले होली, लखन खेले होली” और “गोरिया करी के श्रृंगार, पिसे ले चलली हरदिया” जैसे पारंपरिक फागुन गीत ढोल-मंजीरे की थाप पर गाए जाते थे। इन गीतों में लोक संस्कृति, आस्था और प्रेम का अद्भुत संगम झलकता था। लोग गीतों की धुन पर झूम उठते थे और पूरा गांव रंग और उमंग में सराबोर हो जाता था।

होली की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती थीं। बच्चे घर-घर जाकर होलिका दहन के लिए जलावन (लकड़ी) इकट्ठा करते थे। यह परंपरा केवल रस्म नहीं, बल्कि सामूहिक सहयोग, सहभागिता और सामाजिक एकता का प्रतीक हुआ करती थी।

होलिका दहन के दिन संध्या समय फाग गीत गाने वाली टोली पूरे उत्साह के साथ गाते-बजाते निर्धारित स्थल पर पहुंचती थी और विधि-विधान से होलिका दहन किया जाता था। इस पावन अवसर पर गांव के सभी लोग एकत्र होकर पूजा-अर्चना करते थे।

अगली सुबह होलिका की बची हुई राख को लोग शुभ मानकर एक-दूसरे पर लगाते थे। इसके बाद शुरू होती थी रंगों और मस्ती की होली। लोग एक-दूसरे को कीचड़ लगाते, रंग-गुलाल से सराबोर करते और हंसी-ठिठोली के बीच दिनभर उत्सव का आनंद लेते थे।

संध्या समय लोग साफ-सुथरे वस्त्र पहनकर एक-दूसरे के घर जाते, गुलाल लगाकर गले मिलते और होली की शुभकामनाएं देते थे। इस प्रकार कतरीसराय की परंपरागत होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, भाईचारे और लोक-संस्कृति का जीवंत उदाहरण हुआ करती थी।

हालांकि, वर्तमान समय में यह पारंपरिक स्वरूप धीरे-धीरे विलुप्त होता जा रहा है। डीजे की धुन पर बजने वाले अश्लील भोजपुरी गीतों ने पारंपरिक फाग गीतों की जगह ले ली है। इसके कारण होली का सांस्कृतिक और सामाजिक स्वरूप प्रभावित हुआ है। रंगों का यह पावन पर्व, जो कभी सामाजिक एकता और सद्भाव का प्रतीक था, आज अपनी मूल पहचान खोता नजर आ रहा है।

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