नालंदा में पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय साहित्य उत्सव का भव्य शुभारंभ, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान को गार्ड ऑफ ऑनर, शशि थरूर बोले— नालंदा ज्ञान बांटने की परंपरा का प्रतीक

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राजगीर/नालंदा : नालंदा जिले के अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन हॉल, राजगीर में 21 दिसंबर से 25 दिसंबर तक आयोजित होने वाले पांच दिवसीय नालंदा साहित्य विकास उत्सव (नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल) का भव्य शुभारंभ हुआ। इस अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक महोत्सव का उद्घाटन बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने किया। उद्घाटन अवसर पर राज्यपाल को गार्ड ऑफ ऑनर प्रदान किया गया।

उद्घाटन समारोह में तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस सांसद एवं प्रख्यात लेखक डॉ. शशि थरूर, पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, महोत्सव की चेयरपर्सन श्रीमती दिया आलिया, निदेशक गंगा कुमार सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे।

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पांच दिवसीय इस साहित्यिक आयोजन में देश ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी प्रतिष्ठित साहित्यकार, चिंतक, कलाकार और विद्वान भाग ले रहे हैं। उत्सव के दौरान विरासत, भाषा और साहित्य से जुड़े विषयों पर विशेष सत्र, संवाद और विमर्श आयोजित किए जा रहे हैं।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्ता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों से इसलिए जीवंत बनी हुई है क्योंकि यहां ज्ञान की अविरल और निर्मल धारा निरंतर बहती रही है।

उन्होंने कहा, “यह संसार एक विष वृक्ष की तरह है, लेकिन इसमें दो अमृत फल हैं— साहित्य और सज्जनों का संग। साहित्य, कला, नृत्य और संगीत का उद्देश्य मनुष्य को परम सत्य के समीप ले जाना है।”

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राज्यपाल ने अल्लामा इकबाल की प्रसिद्ध पंक्तियों—
‘यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहां से,
बाकी मगर है अब तक नामो-निशां हमारा’

का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय संस्कृति की निरंतरता का रहस्य बताया है। टैगोर के अनुसार, भारत ने कठिन परिस्थितियों में भी उन जीवंत शब्दों को सुरक्षित रखा, जो उसकी आलोकित चेतना से उत्पन्न हुए।

राज्यपाल ने मैसूर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. बी. एन. श्री के कथन— “भारत चिर पुरातन है, लेकिन कभी पुराना नहीं होता” —का उल्लेख करते हुए कहा कि यह तभी संभव है जब ज्ञान की धारा सतत प्रवाहित होती रहे।

उन्होंने अपरा और परा विद्या की चर्चा करते हुए कहा कि भौतिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और वेद-उपनिषद अपरा विद्या की श्रेणी में आते हैं, जबकि परा विद्या आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाती है।

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स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए राज्यपाल ने कहा कि भारतीय परंपरा केवल सहिष्णुता की नहीं, बल्कि सम्मान और स्वीकार की संस्कृति है। उन्होंने कहा, “भारत ने विश्व को बुद्ध दिया है, युद्ध नहीं।”

नालंदा केवल इतिहास नहीं, ज्ञान का जीवंत केंद्र: शशि थरूर

कांग्रेस सांसद एवं लेखक डॉ. शशि थरूर ने अपने संबोधन में कहा कि नालंदा केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि सदियों से ज्ञान की अनुशासित खोज का प्रतीक रहा है।

उन्होंने कहा, “नालंदा का अर्थ है— ज्ञान देने वाला, सदैव बांटने वाला। यह दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में केवल शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि बौद्धिक विमर्श का जीवंत अखाड़ा था।”

डॉ. थरूर ने बताया कि अपने पहले 800 वर्षों में नालंदा विश्वविद्यालय तीन बार नष्ट हुआ और दो बार पुनर्निर्मित किया गया, फिर भी यहां ज्ञान की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई।

डॉ. थरूर ने कहा कि नालंदा लिटरेचर फेस्टिवल भारत की असाधारण भाषाई बहुलता का उत्सव है। संस्कृत, संथाली, मैथिली, मणिपुरी सहित अनेक भाषाएं— जिनमें उनकी मातृभाषा मलयालम भी शामिल है— भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती हैं।

उन्होंने कहा कि बिहार और पूर्वोत्तर भारत की साहित्यिक आवाजों को मंच देकर यह महोत्सव उन परंपराओं को दृश्यता प्रदान करता है, जिन्हें अक्सर साहित्यिक विमर्श में हाशिये पर रखा जाता है।

इस अवसर पर सांसद डॉ. सोनल मानसिंह, पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के सचिव चंचल कुमार, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सचिन चतुर्वेदी, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह सहित अनेक गणमान्य अतिथि मौजूद रहे।

इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, स्वीडन, वियतनाम, श्रीलंका और जापान से आए बौद्ध भिक्षुओं की उपस्थिति ने इस आयोजन को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया।

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