काशी और नालन्दा भारतीय ज्ञान परम्परा के दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्तम्भ – प्रो. सिद्धार्थ सिंह

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अनुमंडल संवाददाता राजगीर, राजीव लोचन की रिपोर्ट—-

सिलाव (नालंदा): बनारस लिटरेचर फेस्टिवल के अंतर्गत आयोजित विशिष्ट संवाद सत्र “काशी एवं नालंदा : भारतीय ज्ञान-परंपरा के सारस्वत केंद्र” में नव नालंदा महाविहार, नालंदा के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा की ऐतिहासिक निरंतरता और वैश्विक प्रासंगिकता पर गहन विचार व्यक्त किए।

अपने संबोधन में प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने कहा कि काशी और नालंदा केवल भौगोलिक या ऐतिहासिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक चेतना के जीवंत प्रतीक हैं। काशी ने जहां वैदिक, उपनिषदिक और शैव-शाक्त परंपराओं को पोषित किया, वहीं नालंदा ने बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र, विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के माध्यम से विश्व को ज्ञान का मार्ग दिखाया।

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उन्होंने कहा कि नालंदा महाविहार प्राचीन भारत का ऐसा वैश्विक विश्वविद्यालय था, जहाँ एशिया के विभिन्न देशों से विद्यार्थी ज्ञानार्जन हेतु आते थे, और यह परंपरा आज नव नालंदा महाविहार के माध्यम से पुनः सजीव हो रही है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारत की ज्ञान परंपरा संवाद, सहअस्तित्व और करुणा पर आधारित रही है, जो आज के वैश्विक संकटों के समाधान में भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।

प्रो. सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्पाठ की आवश्यकता है, ताकि युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ते हुए वैश्विक नागरिक के रूप में विकसित हो सके।
कार्यक्रम में हिंदी विद्वान एवं पत्रकार डॉ. प्रमोद पांडेय ने प्रो. सिंह के साथ संवाद किया। संवाद सत्र में बड़ी संख्या में विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं छात्रों की उपस्थिति रही।

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