बौद्ध दर्शन मानवीय मुक्ति और सामाजिक न्याय का सशक्त आधार: प्रो. सिद्धार्थ सिंह
अनुमंडल संवाददाता, राजगीर। राजीव लोचन की रिपोर्ट, राजगीर(नालंदा)। देशकाल सोसाइटी द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय संवाद कार्यक्रम ‘बोधगया ग्लोबल डायलॉग्स 2026’ के आठवें संस्करण में नव नालंदा महाविहार ने प्रमुख भागीदार संस्थान के रूप में शिरकत की। शनिवार को बिहार संग्रहालय (पटना) में आयोजित इस दो दिवसीय समागम में देश-विदेश के विद्वान, राजनयिक और शोधकर्ता ‘बौद्ध विरासत, संस्कृति और स्थिरता’ जैसे गंभीर विषयों पर मंथन करने जुटे। कार्यक्रम के दौरान ‘बौद्ध दर्शन, अंबेडकर और मानवीय मुक्ति’ विषय पर आयोजित अकादमिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए नव नालंदा महाविहार के कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने बौद्ध दर्शन की प्रासंगिकता पर जोर दिया। कहा बौद्ध दर्शन मूल रूप से मानवीय मुक्ति, समानता और करुणा का दर्शन है। इसने भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की चेतना को गहराई से प्रभावित किया है। बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म को केवल एक धार्मिक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता और समानता पर आधारित एक नैतिक और सामाजिक क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया था। बुद्ध का धम्म मनुष्य को जाति, वर्ग और अन्य सामाजिक विभाजनों के बंधनों से मुक्त करता है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में, जहां दुनिया असमानता, हिंसा और सामाजिक विखंडन जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, बुद्ध की शिक्षाएं और डॉ. अंबेडकर के विचार शांति, समानता और बंधुत्व का मार्ग दिखाते हैं। प्राचीन नालंदा की ज्ञान परंपरा हमेशा संवाद, तर्क और बौद्धिक विमर्श पर आधारित रही है। इस तरह के अंतरराष्ट्रीय मंच न केवल उस विरासत को आगे बढ़ाते हैं, बल्कि बौद्ध अध्ययन को समकालीन वैश्विक बौद्धिक विमर्श से जोड़ने का अवसर भी प्रदान करते हैं। इस अवसर पर पाली एवं अन्य भाषा संकाय के अधिष्ठाता प्रो. विश्वजीत कुमार, डॉ. जितेंद्र कुमार सहित महाविहार के शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र उपस्थित रहे। इस भागीदारी के माध्यम से नव नालंदा महाविहार ने बौद्ध अध्ययन, पाली साहित्य और नालंदा की प्राचीन ज्ञान परंपरा के संरक्षण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः दोहराया।
