19वां ह्वेनसांग स्मृति वार्षिक दिवस गरिमामय वातावरण में आयोजित, आचार्य ह्वेनसांग ने सम्पूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया- शू वेई

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ह्वेनसांग स्मृति दिवस भारत–चीन की प्राचीन साझा सभ्यता का उत्सव है- कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह

अनुमंडल संवाददाता, राजगीर, राजीव लोचन की रिपोर्ट राजगीर (नालंदा) : भारत और चीन के प्राचीन सांस्कृतिक एवं बौद्धिक संबंधों को स्मरण और सुदृढ़ करने के उद्देश्य से नव नालंदा महाविहार द्वारा गुरुबार को ह्वेनसांग स्मारक परिसर, नालंदा में 19वां ह्वेनसांग स्मृति वार्षिक दिवस गरिमामय वातावरण में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल प्राचीन नालंदा महाविहार के समीप स्थित परिसर में आयोजित किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ विशिष्ट अतिथियों के आगमन के पश्चात महान आचार्य ह्वेनसांग की प्रतिमा पर पुष्पांजलि, धूप-दीप अर्पण एवं मंगलपाठ के साथ हुआ, जिसका नेतृत्व पालि विभाग के आचार्यगण एवं भिक्षुओं ने किया।

समारोह में कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने मुख्य अतिथि श्री शू वेई ,कोलकाता स्थित चीन के महावाणिज्यदूत (कौंसल जनरल ) को खतक एवं बुद्ध प्रतिमा भेंट कर नव नालंदा महाविहार की ओर से कृतज्ञता स्वरूप सम्मानित किया।

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कार्यक्रम का स्वागत भाषण प्रो. विश्वजीत कुमार, अधिष्ठाता, पालि एवं अन्य भाषाएँ संकाय द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने कहा कि ह्वेनसांग स्मृति दिवस एशिया की साझा बौद्धिक परंपरा, नालंदा की वैश्विक भूमिका तथा अंतर-सांस्कृतिक संवाद का प्रतीक है।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री शू वेई ने कहा कि महान आचार्य ह्वेनसांग ने न केवल चीन बल्कि सम्पूर्ण एशिया में बौद्ध धर्म और दर्शन को गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने कहा कि ह्वेनसांग स्मारक परिसर भारत और चीन जो विश्व की दो महान सभ्यताएं हैं के बीच आपसी सम्मान और पारस्परिक सीख का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि भारत और चीन दो समृद्ध सभ्यताएँ हैं जिन्होंने इतिहास में एक-दूसरे से निरंतर ज्ञान अर्जित किया है। मुख्य अतिथि ने उल्लेख किया कि वर्ष 2035 में भारत-चीन राजनयिक संबंधों की 75वीं वर्षगांठ होगी और इस अवसर तक जन-जन के बीच सहयोग को और सशक्त करने की आकांक्षा है। उन्होंने भारत और चीन के बीच व्यापार, व्यवसाय तथा शैक्षणिक आदान-प्रदान पर भी प्रकाश डाला।

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मुख्य अतिथि ने भारत द्वारा चीन के लिए पर्यटक वीज़ा की बहाली, दोनों देशों के बीच अधिक उड़ानों की संभावनाओं, व्यापार, व्यवसाय, छात्रों और अकादमिक जगत को होने वाले लाभों पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जन-जन का संपर्क ही दोनों देशों के रिश्तों को स्थायी मजबूती प्रदान करेगा और आज का यह आयोजन ऐसे ही सार्थक संवादों का प्रतिबिंब है। यह स्मारक न केवल इतिहास को संरक्षित करता है, बल्कि भारत-चीन के भविष्य के संबंधों पर भी दृष्टि केंद्रित करता है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सिद्धार्थ सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि ह्वेनसांग स्मृति दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत और चीन की प्राचीन साझा सभ्यता का उत्सव है। उन्होंने कहा कि भारत-चीन संबंध आधुनिक कूटनीति से कहीं आगे जाकर हजारों वर्षों पुरानी बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत पर आधारित हैं।

उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म ने इन संबंधों को गहराई प्रदान की, जिसके कारण ह्वेनसांग, ई-त्सिंग जैसे अनेक चीनी विद्वान भारत आए तथा भारत के अनेक आचार्य चीन गए। उन्होंने पालि परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि ‘सासनवंस’ जैसे ग्रंथों में चीन को ज्ञान की भूमि कहा गया है।


कुलपति ने कहा कि यदि ह्वेनसांग और ई-त्सिंग भारत से बौद्ध ग्रंथों को चीन न ले गए होते, तो आज बौद्ध संस्कृति को उसके वर्तमान स्वरूप में समझना संभव नहीं होता। उन्होंने स्मरण कराया कि 12वीं शताब्दी के आक्रमणों के दौरान भारत में बौद्ध परंपरा को गंभीर क्षति पहुँची, किंतु इन महान यात्रियों के कारण बौद्ध साहित्य चीन में संरक्षित रहा और विभिन्न भाषाओं में अनूदित हुआ।


उन्होंने यह भी कहा कि इन यात्राओं से यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय शिक्षा संस्थान अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए पूर्णतः खुले थे, जहाँ जाति, पंथ या देश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं था। कला के क्षेत्र में भी उन्होंने अजंता गुफा चित्रकला और चीनी चित्रकला परंपराओं के पारस्परिक प्रभाव का उल्लेख किया।


कुलपति ने भारत-चीन संबंधों को सुदृढ़ करने में डॉ. द्वारकानाथ कोटनिस पर बनी फिल्म का भी उल्लेख किया और संयुक्त रूप से अकादमिक एवं शोध कार्यक्रमों के आयोजन का आह्वान किया, ताकि विश्व को शांति, सद्भाव और सह-अस्तित्व का संदेश दिया जा सके। उन्होंने कहा कि पारिवारिक मूल्य, माता-पिता के प्रति सम्मान और नैतिक आदर्श दोनों देशों को गहराई से जोड़ते हैं।


कार्यक्रम का समापन प्रो. रूबी कुमारी, कुलसचिव, नव नालंदा महाविहार द्वारा प्रस्तुत धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। कार्यक्रम का संचालन सुश्री अन्नी सिंह, अंग्रेज़ी विभाग द्वारा किया गया। समारोह में नव नालंदा महाविहार के आचार्यगण, शोधार्थी, बौद्ध भिक्षु, विद्यार्थी तथा बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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